ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि ने कहा : हम 'न युद्ध, न शांति' की स्थिति में हैं
दिलीप
- 02 May 2026, 08:10 PM
- Updated: 08:10 PM
बेंगलुरु, दो मई (भाषा) ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने शनिवार को अपने देश और इजराइल-अमेरिका गठबंधन के बीच जारी तनाव को ''न युद्ध, न शांति'' की स्थिति बताया।
भारत में नियुक्त ईरानी प्रतिनिधि ने संघर्ष को तत्काल रोकने की अपील करते हुए कहा कि वैश्विक स्थिरता उन लोगों पर निर्भर करती है, जिन्होंने इस युद्ध की शुरुआत की।
उन्होंने सवाल किया कि युद्ध से प्रभावित और ऊर्जा संकट से जूझ रहे देश, अमेरिका और इजराइल पर इस हमले को रोकने के लिए दबाव क्यों नहीं डाल रहे हैं।
इलाही ने यहां संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कहा कि ईरान यह युद्ध नहीं चाहता था, लेकिन लगातार हो रहे हमलों के बीच उसे जवाबी कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जबकि बातचीत जारी रहने की उम्मीद थी।
उन्होंने कहा, ''ईरान ने कई बार इस युद्ध से बचने की कोशिश भी की... मुझे नहीं पता कि इन लोगों और इन देशों (अमेरिका-इजराइल) की मानसिकता क्या है... वे दूसरे देशों पर अपनी मर्जी थोपना चाहते हैं, और उन्हें यह अधिकार किसने दिया?''
उन्होंने कहा कि बाद में बातचीत जिनेवा में हुई और उसमें कुछ प्रगति भी हुई, लेकिन अचानक हुए हमलों के कारण वह बाधित हो गई।
इलाही ने दावा किया कि हवाई हमलों और मिसाइल हमलों के कारण ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई, मंत्रियों, कमांडरों और आम नागरिकों की मौत हुई।
ईरानी प्रतिनिधि ने कहा, ''उन्होंने कई आम लोगों को मार डाला... उन्होंने एक प्राथमिक विद्यालय पर हमला किया और 175 बेकसूर लड़कियों की जान ले ली।''
उन्होंने दावा किया कि इस दौरान 4,000 से अधिक लोगों की मौत हुई, 40,000 से ज्यादा लोग घायल हुए तथा घरों, अस्पतालों, विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा।
उन्होंने कहा कि इन नुकसानों के बावजूद, ईरान ने ''बिना शर्त आत्मसमर्पण'' की मांगों का विरोध किया, डटकर मुकाबला किया और अपना बचाव किया।
इलाही ने कहा, ''वे बिना शर्त आत्मसमर्पण चाहते थे, जिसे कोई भी स्वीकार नहीं कर सकता। ईरान ने कहा, 'ठीक है, हम कुर्बान होने के लिए तैयार हैं,' लेकिन हम खुद को उनके हवाले करने के लिए तैयार नहीं हैं।''
उन्होंने तर्क दिया कि उन्होंने (अमेरिका-इजराइल) मौजूदा युद्धविराम का प्रस्ताव तभी रखा, जब उन्हें यह एहसास हो गया कि 40 दिनों के संघर्ष के बाद भी वे अपने किसी भी उद्देश्य को हासिल नहीं कर सकते।
ईरानी प्रतिनिधि ने दावा किया कि यह असल में कोई युद्धविराम है ही नहीं, बल्कि यह ''न युद्ध, न शांति'' वाली स्थिति है।
ईरान में मौजूदा हालात के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि स्थिति स्थिर बनी हुई है और लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी जी रहे हैं।
उन्होंने कहा, ''10,000 वर्षों तक, होर्मुज जलडमरूमध्य खुला रहा... और ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षा मुहैया कराने के लिए हर साल भारी खर्च किया... इसलिए होर्मुज जलडमरूमध्य के बारे में किसी ने कोई शिकायत नहीं की। हर कोई आजाद था... और यहां तक कि हमारे दुश्मन भी अपने युद्धपोत होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजारते थे।''
हालांकि, उन्होंने मौजूदा समुद्री अस्थिरता को अमेरिका और इजराइल की कार्रवाइयों से जोड़ा।
उन्होंने कहा, ''इसलिए ईरान कुछ नहीं कर सकता। जिन लोगों ने इस युद्ध की शुरुआत की, उन्हीं को इसे रोकना होगा। और सब कुछ फिर से सामान्य हो जाएगा।''
इलाही ने ''महान और शक्तिशाली देश'' की मानसिकता की आलोचना करते हुए कहा, ''उन्हें लगता है कि वे जो चाहें, वह करने का उन्हें अधिकार है। इसमें बदलाव आना चाहिए।'' उन्होंने यह जानना चाहा कि संघर्ष से प्रभावित देश, युद्ध को रोकने के लिए अमेरिका और इजराइल पर दबाव क्यों नहीं डाल रहे हैं।
निष्पक्षता और न्याय की मांग करते हुए इलाही ने कहा कि युद्ध रोकने के लिए ईरान से कहने के बजाय, संघर्ष प्रभावित देशों को उन लोगों से कहना चाहिए, जिन्होंने इसे शुरू किया है।
उन्होंने कहा, '' वे उनसे कहें कि हमें परेशानी उठानी पड़ रही है।''
अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता से जुड़े एक सवाल पर, अमेरिका का जिक्र करते हुए इलाही ने पूछा, ''क्या यह स्वीकार्य और उचित है कि कोई एक देश सभी देशों को आदेश दे -- कि आपको इस देश के साथ कोई लेन-देन नहीं करना चाहिए, आपको इस देश से कुछ नहीं खरीदना चाहिए। आपको इस देश के साथ कोई व्यापार नहीं करना चाहिए।''
इलाही ने कहा, ''अभी भी, भारत के साथ हमारे रिश्ते, सहयोग और तालमेल बहुत अच्छे हैं।'' उन्होंने कहा कि ईरान द्वारा भारतीय जहाजों को होर्मुज से गुजरने की अनुमति देना, दोनों देशों के बीच के मजबूत रिश्तों को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि ईरान ने भारतीय जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दी और ऐसा इसलिए हुआ कि ईरान और भारत के बीच रिश्ते बहुत अच्छे हैं।
उन्होंने विश्वास जताया कि भविष्य में भी ईरान-भारत संबंध मजबूत बने रहेंगे।
भाषा सुभाष दिलीप
दिलीप
0205 2010 बेंगलुरु