नरेंद्र दाभोलकर हत्याकांड : बंबई उच्च न्यायालय ने दोषी करार दिये गए शरद को जमानत दी
नरेश
- 29 Apr 2026, 07:27 PM
- Updated: 07:27 PM
मुंबई, 29 अप्रैल (भाषा) बंबई उच्च न्यायालय ने 2013 में तर्कवादी और अंधविश्वास विरोधी कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में निचली अदालत द्वारा दोषी करार दिये गए शरद कलास्कर को बुधवार को जमानत देने के साथ उसे सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा पर भी रोक लगा दी।
अदालत ने कलास्कर की जमानत अर्जी मंजूर करते हुए कथित हमलावर के रूप में उसकी पहचान पर संदेह जताया और दो 'प्रत्यक्षदर्शियों' की सत्यनिष्ठा पर सवाल उठाया।
न्यायमूर्ति अजय गडकरी और न्यायमूर्ति रणजीत सिंह भोंसले की पीठ ने कलास्कर को 50 हजार रुपये का निजी मुचलका जमा करने और पुणे के दक्कन पुलिस थाना जहां हत्या का मामला दर्ज किया गया था, हर महीने एक बार पेश होने का निर्देश दिया।
कलास्कर ने 2024 में एक विशेष अदालत द्वारा दोषी करार दिये जाने के फैसले को चुनौती दी थी और अपील की अंतिम सुनवाई और निर्णय होने तक जमानत देने का अनुरोध किया था।
कलास्कर पर वामपंथी नेता और तर्कवादी गोविंद पानसरे की हत्या का मुकदमा भी चल रहा है। पिछले साल अक्टूबर में उच्च न्यायालय ने उसे इस मामले में जमानत दे दी थी।
दाभोलकर मामले में जमानत मिलने के बाद, कलास्कर जमानत की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद जेल से रिहा हो सकता है।
महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक दाभोलकर (67) की 20 अगस्त, 2013 को पुणे में सुबह की सैर के दौरान दो मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। दाभोलकर की संस्था अंधविश्वास के खिलाफ कार्य करती है।
न्यायमूर्ति अजय गडकरी और न्यायमूर्ति रणजीत सिंह भोंसले की पीठ ने बुधवार को कहा कि कलास्कर सितंबर 2018 में अपनी गिरफ्तारी के बाद से जेल में हैं, और निकट भविष्य में उच्च न्यायालय द्वारा उसकी दोषसिद्धि के खिलाफ अपील पर सुनवाई किये जाने की संभावना बहुत कम है।
पीठ ने फैसले में कहा, ''हमारी राय है कि अपील लंबित रहने के दौरान, उसको (कलास्कर को) सुनाई गई मूल सजा को निलंबित किया जा सकता है और आवेदक (कलास्कर) को जमानत पर रिहा किया जा सकता है।''
जमानत आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगाने के अभियोजन पक्ष के अनुरोध को अस्वीकार करते हुए पीठ ने कहा, ''चूंकि हमने अपने आदेश में आवेदक (कलास्कर) की पहचान हमलावरों में से एक के रूप में होने पर संदेह व्यक्त किया है, इसलिए रोक लगाने की गुजारिश अस्वीकार की जाती है।''
उच्च न्यायालय ने दो गवाहों के बयानों पर संदेह व्यक्त किया, जिन्हें अभियोजन पक्ष ने प्रत्यक्षदर्शी के रूप में पेश किया था।
पीठ ने रेखांकित किया कि दोनों गवाहों के साक्ष्य स्पष्ट रूप से इंगित करते हैं कि वे ''संयोगवश गवाह'' हैं, क्योंकि यद्यपि दोनों का दावा है कि उन्होंने भयावह हमले को देखा था, फिर भी उन्होंने पहले अपने दैनिक कार्यों को पूरा करना चुना और उसके बाद आराम से पुलिस के पास सूचना देने के लिए पहुंचे।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में लिखा, ''हमारे अनुसार, इन दोनों गवाहों का आचरण सामान्य विवेक वाले व्यक्तियों जैसा नहीं है और इससे अदालत के मन में घटना के उनके प्रत्यक्षदर्शी होने के बारे में संदेह पैदा होता है।''
पीठ ने इस तथ्य पर संज्ञान लिया कि अभियोजन पक्ष ने दो तथाकथित चश्मदीदों के सामने कलास्कर की पहचान परेड नहीं कराई बल्कि उन्हें केवल आरोपी की एक तस्वीर दिखाई।
दाभोलकर की हत्या तीन अन्य तर्कवादियों और कार्यकर्ताओं की हत्याओं की शृंखला में पहली घटना थी। फरवरी 2015 में कोल्हापुर में गोविंद पानसरे, अगस्त 2015 में धारवाड़ में कन्नड़ विद्वान एमएम कालबुर्गी और सितंबर 2017 में बेंगलुरु में पत्रकार गौरी लंकेश की भी हत्या कर दी गई थी।
दाभोलकर हत्या मामले की जांच शुरुआत में स्थानीय पुलिस ने की थी, लेकिन उनकी बेटी मुक्ता दाभोलकर द्वारा उच्च न्यायालय में दायर याचिका के बाद, 2014 में जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दी गई थी।
अभियोजन पक्ष का दावा है कि कलास्कर दभोलकर को गोली मारने वालों में से एक है।
सत्र न्यायालय ने 10 मई, 2024 को सचिन अंदुरे और शरद कलास्कर को दाभोलकर की हत्या का दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
सत्र न्यायालय ने हालांकि, उन्हें सख्त गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और शस्त्र अधिनियम के तहत लगे आरोपों से बरी कर दिया ।
निचली अदालत ने सबूतों के अभाव में वीरेंद्र सिंह तावड़े, संजीव पुनालेकर और विक्रम भावे को भी बरी कर दिया था।
कलास्कर ने उच्च न्यायालय में अपनी सजा को चुनौती दी। उसने अधिवक्ता शुभादा खोट के जरिये दाखिल अर्जी में सुनवाई लंबित रहने के दौरान जमानत देने का अनुरोध किया।
दाभोलकर की बेटी मुक्ता दाभोलकर ने भी अंदुरे और कलास्कर को यूएपीए के आरोपों से बरी करने के निचली अदालत के आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय का रुख किया है।
भाषा धीरज नरेश
नरेश
2904 1927 मुंबई