उत्तर भारत का कोई नास्तिक शबरिमला मंदिर में प्रवेश के अधिकार का दावा कैसे कर सकता है? : न्यायालय
नरेश
- 29 Apr 2026, 03:59 PM
- Updated: 03:59 PM
नयी दिल्ली, 29 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को सवाल किया कि उत्तर भारत का कोई नास्तिक व्यक्ति शबरिमला मंदिर में प्रवेश करने के अधिकार का दावा कैसे कर सकता है।
न्यायालय ने साथ ही कहा कि मंदिरों में प्रवेश के अधिकार के मुद्दे पर फैसला करते समय यह भी देखना होगा कि यह अधिकार कोई श्रद्धालु मांग रहा है या गैर-श्रद्धालु।
नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी केरल में शबरिमला सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं से भेदभाव तथा विभिन्न धर्मों द्वारा अपनाई जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमा से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की।
पीठ में भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल थे।
न्यायालय के 2018 के फैसले का समर्थन कर रहीं दो महिलाओं बिंदु अम्मिनी और कनकदुर्गा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कहा कि याचिकाकर्ताओं में से एक अनुसूचित जाति की महिला है और उसे मंदिर जाने से रोकना संविधान के अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता उन्मूलन) का उल्लंघन होगा।
सितंबर 2018 में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं के शबरिमला अयप्पा मंदिर में प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी और कहा था कि सदियों पुरानी यह हिंदू धार्मिक प्रथा अवैध और असंवैधानिक है।
जयसिंह ने कहा, ''आज हमें बताया जा रहा है कि जातिगत व्यवस्था से परे हिंदू शबरिमला में प्रवेश कर सकते हैं, लेकिन महिलाएं नहीं।'' उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 17 के कारण सभी पुरुषों को, जाति की परवाह किए बिना, प्रवेश का अधिकार है।
पीठ ने इस दलील पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि महिला को अनुसूचित जाति से होने के कारण नहीं रोका गया था, बल्कि इसलिए रोका गया क्योंकि वह 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की थी।
सुनवाई के दौरान जयसिंह ने कहा कि शबरिमला मंदिर में महिलाओं का बहिष्कार उनके जीवन के सबसे उत्पादक और सृजनशील काल, यानी 10 से 50 वर्ष की आयु के बीच लागू होता है।
उन्होंने कहा, ''इस अवधि में महिला की स्थिति क्या है? क्या यह सबसे सृजनशील और सर्वाधिक प्रजनन क्षमता वाला समय नहीं है?... आप मुझे आधा जीवन जीने को नहीं कह सकते। 10 से 50 वर्ष के बीच मत जियो, फिर 10 से पहले और 50 के बाद जियो। इससे गंभीर पृथक्करण होगा।''
जयसिंह ने कहा कि मंदिर में प्रवेश और पूजा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत मौलिक अधिकार है।
उन्होंने तर्क दिया कि 2018 का फैसला आने के बाद दोनों महिलाएं मंदिर गई थीं।
उन्होंने कहा, ''जब वे बाहर आईं, तब कुछ संघ नेताओं ने 'शुद्धिकरण' की बात की। मैंने इस अदालत में याचिका दायर की। उस समय फैसला पूरी तरह लागू था। यही दो महिलाएं थीं जो ऊपर चढ़ने और दर्शन करने में सफल हुईं।''
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, ''तब से कोई और सफल नहीं हुआ। क्यों? क्योंकि राज्य ने सहयोग नहीं किया। ऊपर जाने के लिए सुरक्षा देने से इनकार कर दिया गया। मैंने इस अदालत में याचिका दायर की, जिसमें मैंने सभी तथ्य दर्ज किए, जिनमें वे कौन हैं, क्या वे श्रद्धालु हैं, और किस राज्य से हैं, यह भी शामिल है।''
इस पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ''यह अधिकार कौन मांग रहा है? क्या कोई श्रद्धालु यह अधिकार मांग रहा है या कोई गैर-श्रद्धालु और किसके कहने पर? एक व्यक्ति जिसका इस मंदिर से कोई संबंध नहीं है, वह कहीं उत्तर भारत में है। यह मंदिर दक्षिण भारत में है। प्रवेश का अधिकार मांगने का यह प्रश्न भी विचारणीय है।''
मामले की सुनवाई जारी है।
शीर्ष अदालत ने पहले कहा था कि किसी धार्मिक संप्रदाय की किसी विशेष प्रथा को आवश्यक या गैर-आवश्यक घोषित करने के लिए मापदंड परिभाषित करना न्यायिक मंच के लिए यदि असंभव नहीं, तो बहुत मुश्किल है।
भाषा गोला नरेश
नरेश
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