बंगाल चुनाव: बागदा, गायघाट में मतुआ प्रथम परिवार में विभाजन गहराया, एआईआर से झटका
प्रशांत
- 25 Apr 2026, 08:07 PM
- Updated: 08:07 PM
(प्रदीप्त तापदार)
बागदा (पश्चिम बंगाल), 25 अप्रैल (भाषा) पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश की सीमा से सटे उत्तरी 24 परगना जिले में मतुआ समुदाय के गढ़-- बागदा और गायघाट- में चुनाव भाजपा-तृणमूल कांग्रेस के बीच पारंपरिक मुकाबले से कहीं आगे निकल गया है।
अब यह चुनावी लड़ाई विभाजित मतुआ प्रथम परिवार के बीच चल रही है, जिसमें भाई, पत्नियां और चचेरे भाई-बहन प्रतिद्वंद्वी खेमों से चुनाव लड़ रहे हैं। उधर, मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) ने शरणार्थी हिंदुओं के बीच नयीं चिंताएं पैदा कर दी हैं, जो कभी एक साथ मतदान करते थे।
मूल रूप से पूर्वी पाकिस्तान के रहने वाले मतुआ हिंदू हैं, जो विभाजन के दौरान और बांग्लादेश बनने के बाद भारत में आकर बस गए थे।
मतुआ महासंघ के मुख्यालय ठाकुरनगर में चाय की दुकानों, दरवाजों और पार्टी कार्यालयों में चिंता साफ दिखाई देती है। परिवार दबी जुबान में कह रहे हैं कि अंतिम मतदाता सूची से कई नाम गायब हो गये एवं कई मतदाताओं को 'विचाराधीन' के दायरे में रखा गया है। उनका यह भी कहना है कि दशकों से रह रहे इन लोगों से अचानक यह साबित करने के लिए कहा जा रहा है कि वे इसी इलाके के निवासी हैं।
ठाकुरनगर के ठाकुर परिवार को अक्सर मतुआ समुदाय का 'प्रथम परिवार' कहा जाता है क्योंकि यह अपने वंश को संप्रदाय के संस्थापक हरिचंद ठाकुर से जोड़ता है। इसने समुदाय के धार्मिक नेतृत्व और राजनीतिक दिशा को आकार दिया है।
इस तनाव के चलते बोंगांव उपमंडल के बागदा और गायघाट ऐसे निर्वाचन क्षेत्र बन गये हैं जिनपर 29 अप्रैल को होने वाले दूसरे चरण के चुनाव में सबसे अधिक नजर है।
बागदा में चुनावी मुकाबला ठाकुरबाड़ी के बैठक कक्ष तक पहुंच गया है। तृणमूल कांग्रेस ने राज्यसभा सदस्य ममताबाला ठाकुर की बेटी निवर्तमान विधायक मधुपरना ठाकुर को चुनाव मैदान में उतारा है। भाजपा ने केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर की पत्नी सोमा ठाकुर को उम्मीदवार बनाया है।
इसका परिणाम दो रिश्तेदारों के बीच एक दुर्लभ राजनीतिक द्वंद्व के रूप में सामने आया है, जिसमें दोनों ही मतुआ की विरासत का प्रतिनिधित्व करने का दावा कर रही हैं।
बागदा निर्वाचन क्षेत्र में अनुसूचित जाति के मतदाता 53 प्रतिशत से अधिक और मतुआ समुदाय के मतदाता 40 प्रतिशत से अधिक हैं। बागदा को लंबे समय से शरणार्थी बहुल क्षेत्र में राजनीतिक संकेतक के रूप में देखा जाता रहा है।
भाजपा के बिस्वजीत दास ने 2021 में लगभग 49 प्रतिशत वोटों के साथ यह सीट जीती थी। लेकिन बाद में वह तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए।
बाद में 2024 के उपचुनाव में तृणमूल ने ठाकुर परिवार की सबसे युवा सदस्य मधुपरना ठाकुर को मैदान में उतारा और उन्होंने 55 प्रतिशत से अधिक वोटों के साथ जीत हासिल की।
लेकिन भाजपा का सोमा ठाकुर को उम्मीदवार बनाने का फैसला कई स्थानीय कार्यकर्ताओं को रास नहीं आया है। वे एक स्थानीय चेहरा चाहते थे और उन्होंने पूर्व भाजपा विधायक दुलल बार का समर्थन किया, जो अब निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं।
पड़ोसी निर्वाचन क्षेत्र गायघाट में भी इसी तरह का असंतोष देखने को मिल रहा है, जहां भाजपा विधायक सुब्रत ठाकुर पुन: चुनाव लड़ रहे हैं। सुब्रत ठाकुर शांतनु ठाकुर के बड़े भाई और अखिल भारतीय मतुआ महासंघ के अध्यक्ष हैं।
गायघाट 2021 में भाजपा की सबसे महत्वपूर्ण जीतों (निर्वाचन क्षेत्रों की जीत) में से एक थी। सुब्रत ठाकुर ने लगभग 47 प्रतिशत वोटों के साथ यह सीट जीती, जिससे मतुआ समुदाय का समर्थन और मजबूत हुआ। मतुआ समुदाय का झुकाव नागरिकता के वादे के बाद भाजपा की ओर दिखता है।
इस बार सुब्रत ठाकुर को न केवल तृणमूल उम्मीदवार नरोत्तम बिस्वास का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि अपनी ही पार्टी में असंतोष का भी सामना करना पड़ रहा है। भाजपा मंडल अध्यक्ष तनिमा सेन ने सुब्रत की उम्मीदवारी के विरोध में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल किया तथा पार्टी पर 'पारिवारिक उम्मीदवार' थोपने और जमीनी स्तर की राय की अनदेखी करने का आरोप लगाया।
हालांकि भाजपा नेतृत्व के साथ सुलह के बाद उन्होंने बाद में अपना नाम वापस ले लिया, लेकिन इस घटनाक्रम ने अंदरूनी असंतोष को उजागर कर दिया।
मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के कारण विद्रोह और भी तेज हो गया है। पार्टी नेताओं और स्थानीय अनुमानों के अनुसार, बागदा में लगभग 55,000 नाम और गायघाट में लगभग 39,000 नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए।
उत्तर 24-परगना में मतुआ शरणार्थियों की सबसे बड़ी आबादी है, लेकिन एसआईआर के बाद 12.3 लाख से अधिक नाम हटा दिए गए।
भाजपा के लिए, इन नामों को हटाए जाने से उसके राजनीतिक संदेश की नींव को गहरा झटका लगा है। 2019 से, पार्टी ने मतुआ क्षेत्र में अपनी लोकप्रियता एक सरल विचार के आधार पर बढ़ाई थी - भाजपा का समर्थन करें, और नागरिकता संबंधी अनिश्चितता सीएए के माध्यम से समाप्त हो जाएगी। लेकिन नागरिकता प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करने वाले कई लोग अब दावा कर रहे हैं कि उनके नाम मतदाता सूची से गायब हो गए हैं।
गायघाट निवासी सुखमय हलदर ने कहा,''हमें नागरिकता का वादा किया गया था। अब हमें बताया जा रहा है कि हम शायद वोट भी नहीं दे पाएंगे।''
इस बेचैनी के राजनीतिक परिणाम भी सामने आए हैं। गायघाट में, अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद 61 भाजपा कार्यकर्ता तृणमूल में शामिल हो गए। बागदा में, लगभग 50 मतुआ परिवारों ने पाला बदल लिया।
शांतनु ठाकुर ने कहा कि प्रभावित मतदाता अपना नाम बहाल करवाने के लिए न्यायाधिकरणों का रुख कर सकते हैं। प्रदेश भाजपा नेताओं ने गुटबाजी की बातों को खारिज करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील से पार्टी को अब भी लाभ होगा।
भाषा
राजकुमार प्रशांत
प्रशांत
2504 2007 बागदा