टाटा मोटर्स के जाने के 18 साल बाद भी बदहाल जमीन व राजनीतिक विरासत के बीच फंसा है सिंगूर
दिलीप
- 25 Apr 2026, 05:24 PM
- Updated: 05:24 PM
(प्रदीप्त तापदार)
सिंगूर (पश्चिम बंगाल), 25 अप्रैल (भाषा) पश्चिम बंगाल में राजनीतिक रूप से सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक सिंगूर में लोग जमीन खोदकर जंग लगी लोहे की छड़ें कबाड़ के रूप में बेचने के लिए ढूंढ रहे हैं, जो टाटा मोटर्स की परित्यक्त नैनो फैक्टरी के अवशेष हैं ।
टाटा मोटर्स ने 2008 में लगातार विरोध प्रदर्शनों के बीच यहां छोटी कारों का कारखाना स्थापित करने की योजना छोड़ दी थी। इस घटना से राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव आया था, जिससे वाम मोर्चा सत्ता से बेदखल हो गया और ममता बनर्जी सत्ता में आईं।
अठारह साल बीत जाने के बाद भी, टाटा मोटर्स का वह फैसला आज भी सिंगूर को परेशान करता है, क्योंकि यह इलाका दो तरह की बर्बादी के बीच फंसा हुआ है — एक ऐसी कृषि भूमि जो अब पहले जैसा उत्पादन नहीं देती और एक ऐसी फैक्टरी, जो कभी बन ही नहीं पाई।
'मास्टरमोशाय' के नाम से मशहूर तृणमूल कांग्रेस के पूर्व विधायक रवींद्र भट्टाचार्य (93) ने कहा, ''न तो कृषि का विकास हुआ, न ही उद्योग का।'' भट्टाचार्य सिंगूर आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे।
वर्ष 2006 में, तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने टाटा मोटर्स की छोटी कार परियोजना के लिए यहां लगभग 1,000 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया। तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने इस दावे के आधार पर जनांदोलन खड़ा किया कि उपजाऊ बहु-फसली भूमि अनिच्छुक किसानों से छीनी जा रही है।
इसके बाद जो हुआ, उसने बंगाल की राजनीति को पूरी तरह से बदल दिया।
जब रतन टाटा ने अक्टूबर 2008 में घोषणा की कि नैनो परियोजना को गुजरात के साणंद में स्थानांतरित किया जाएगा, तो यह केवल एक कारखाने की विदाई नहीं थी, बल्कि यह वाममोर्चा के 34 वर्षों के शासन के अंत की शुरुआत थी।
सिंगूर और नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण विरोधी तीव्र आंदोलनों के सफल नेतृत्व के दम पर, 2011 के विधानसभा चुनाव जीतने के बाद ममता बनर्जी ने राज्य की सत्ता के केंद्र 'रायटर्स बिल्डिंग' में प्रवेश किया, लेकिन स्वयं सिंगूर में, वह जीत अब धीरे-धीरे पछतावे में बदल गई है।
उच्चतम न्यायालय ने 2016 में 'अनिच्छुक' किसानों को जमीन वापस देने का निर्णय सुनाया, जिसे तृणमूल कांग्रेस ने अपनी जीत मानी एवं जश्न मनाया। कागजों पर तो जमीन वापस मिल गई, लेकिन जमीनी हकीकत में काफी हद तक ऐसा नहीं हुआ।
काफी बड़े क्षेत्र आज भी कंक्रीट, दबे हुए लोहे और खरपतवारों से भरे पड़े हैं। कुछ जगहों पर कारखाने के लिए हटाई गई ऊपरी मिट्टी कभी वापस नहीं डाली गई।
किसान आशीष बेरा ने कहा, ''मैंने अपनी तीन बीघा जमीन साफ कराने में ही 1.5 लाख रुपये खर्च कर दिए। इससे पहले हम धान, जूट, आलू और सब्जियां उगाते थे। जमीन उपजाऊ थी। अब उसमें मुश्किल से कुछ उगता है।''
यह विडंबना विशेष रूप से हुगली नदी बेसिन में स्थित उस निर्वाचन क्षेत्र में स्पष्ट नजर आती है, जो दामोदर और सरस्वती नदियों से घिरा हुआ है, जहां की मिट्टी कभी धान, सब्जियों और फूलों की सघन खेती के लिए जानी जाती थी।
कई परिवारों के लिए, यह ज़मीन आजीविका के साधन के बजाय महज़ एक याद बनकर वापस आई।
कभी भूमि-विरोधी आंदोलन के सबसे जाने-माने चेहरों में से एक रहे महादेव दास अब बंजर जमीन के किनारे एक चाय की दुकान पर बैठे रहते हैं।
उन्होंने कहा, "मेरे पास 12 बीघा जमीन, ट्रैक्टर, पावर टिलर और पंप थे। मैंने उस ज़मीन के इर्द-गिर्द अपना पूरा कारोबार खड़ा कर लिया था। अब मेरे पास कुछ नहीं है। हमने इस कंक्रीट से भरी जमीन के लिए लड़ाई नहीं लड़ी थी।"
सिंगूर में सबसे बड़ा राजनीतिक बदलाव यह है कि नैनो संयंत्र का विरोध करने वाले कई लोग अब खुलेआम स्वीकार करते हैं कि वे गलत थे।
कार चालक बिकास दास कभी एक सक्रिय कार्यकर्ता था।
दास ने कहा, "हमें बताया गया था कि बहुफसली भूमि पर उद्योग नहीं लगने चाहिए। हमने उनकी बात मान ली। आज हम हर चीज से वंचित हैं। अगर कारखाना बना रहता, तो मेरे पास नौकरी होती।"
यह पछतावा युवाओं में सबसे गहरा है।
कोलकाता के एक कॉल सेंटर में काम करने वाली स्नातकोत्तर साथी दास कहती हैं कि उनके पिता भी अनिच्छुक किसानों में से थे। उन्होंने कहा, ''मेरे पिता को ज़मीन वापस मिल गई, लेकिन वह खेती के लायक नहीं है। अगर फैक्टरी वहीं रहती, तो हमें सिंगूर छोड़कर नहीं जाना पड़ता।''
नैनो संयंत्र में नौकरियों के लिए प्रशिक्षण लेने वाले कई युवा अब ऐप-आधारित टैक्सी (जैसे ओला-उबर) चला रहे हैं, नकली आभूषण बनाने वाली इकाइयों में काम कर रहे हैं या फिर बंगाल से बाहर पलायन कर चुके हैं।
पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल के दूसरे चरण के चुनाव नजदीक आने के साथ ही, सिंगूर एक बार फिर राजनीतिक रणक्षेत्र बन गया है।
इस निर्वाचन क्षेत्र में 2,42,087 मतदाता हैं, जबकि 2024 में यहां 2,51,585 मतदाता थे। करीब दो तिहाई मतदाता ग्रामीण क्षेत्रों में हैं।
आक्रोश के बावजूद, सिंगूर तृणमूल की सबसे सुरक्षित सीटों में से एक बनी हुई है। पार्टी ने यहां लगातार पांच बार जीत हासिल की है। 2021 में, मौजूदा विधायक बेचाराम मन्ना ने तत्कालीन भाजपा सदस्य भट्टाचार्य को 25,923 वोटों से हराया था। तृणमूल ने 2024 के लोकसभा चुनाव में भी इस निर्वाचन क्षेत्र में बढ़त बनाई थी।
तृणमूल प्रत्याशी और मंत्री बेचाराम मन्ना ने कहा, ''सिंगूर के लोग जानते हैं कि जब उनकी जमीन छीनी जा रही थी, तब कौन उनके साथ खड़ा था। कुछ समस्याएं बनी हुई हैं, लेकिन सड़कें, सामाजिक योजनाएं और मुआवजा हर परिवार तक पहुंच चुका है।''
भाजपा मानती है कि लोगों का मन बदल रहा है। एक भाजपा नेता ने कहा, ''तृणमूल ने सत्ता में आने के लिए सिंगूर का इस्तेमाल किया, लेकिन बाद में लोगों को छोड़ दिया।''
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फरवरी में सिंगूर में एक रैली को संबोधित किया और तृणमूल पर बंगाल से उद्योग को बाहर निकालने का आरोप लगाया। कुछ दिनों बाद ममता बनर्जी ने भी यहीं अपनी रैली की।
भाषा
राजकुमार दिलीप
दिलीप
2504 1724 सिंगूर