सात सांसदों के आप छोड़ने से 2027 के लिए पार्टी की चुनावी तैयारियों पर असर
पवनेश
- 24 Apr 2026, 10:22 PM
- Updated: 10:22 PM
नयी दिल्ली, 24 अप्रैल (भाषा) राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह और स्वाति मालीवाल जैसे प्रमुख चेहरों सहित सात सांसदों के शुक्रवार को आम आदमी पार्टी (आप) छोड़ने के साथ, न केवल संसद में 'आप' का संख्या बल घटा है, बल्कि आगामी चुनावों के लिए उसकी तैयारियों में भी बाधा उत्पन्न हुई है।
बीते दो साल पार्टी के लिए काफी उथल-पुथल भरे रहने की पृष्ठभूमि में यह घटनाक्रम हुआ। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया सहित इसके कई शीर्ष नेताओं को आबकारी नीति 'घोटाले' के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था।
उस दौरान, चड्ढा सहित दूसरी पंक्ति के नेता सरकार और संगठन, दोनों को सुचारू रूप से चलाने के लिए आगे आये थे।
इन सात सांसदों में से कई को पार्टी की पहुंच को आकार देने में प्रमुख स्तंभ के रूप में देखा जा रहा था - चाहे वह नीतिगत अभिव्यक्ति हो, संगठनात्मक रणनीति हो, वित्त हो या फिर सार्वजनिक रूप से संदेश देना हो। अब, उनके एक साथ पार्टी छोड़ कर जाने को एक नियमित राजनीतिक बदलाव से कहीं अधिक एक संगठनात्मक नुकसान के रूप में देखा जा रहा है।
चड्ढा ने शुक्रवार को कहा कि सात सांसदों ने भाजपा में विलय कर लिया है और दावा किया कि आम आदमी पार्टी अपने सिद्धांतों एवं मूल्यों से भटक गई है। चड्ढा के अलावा, पाठक, मित्तल, सिंह और मालीवाल, राजेंद्र गुप्ता और विक्रम साहनी ने भी केजरीवाल के नेतृत्व वाली पार्टी छोड़ दी है।
'आप' के सात सांसदों के इस्तीफे का समय पार्टी के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। पार्टी अगले साल गुजरात, गोवा और पंजाब में होने वाले चुनावों की तैयारी कर रही है।
दिल्ली में पार्टी तीन बार सरकार बना चुकी है और उसका मजबूत जनाधार है।
'आप' नेताओं ने कहा कि पार्टी के जमीनी स्तर से जुड़ाव और शासन के सिद्धांत, नेताओं के जाने के बावजूद बरकरार हैं।
पार्टी पंजाब में सत्ता में बनी हुई है और दिल्ली में भी उसकी उपस्थिति बरकरार है, साथ ही गुजरात और जम्मू कश्मीर में भी उसकी कुछ हद तक पहुंच है।
हालांकि, राज्यसभा में उसके सदस्यों की संख्या 10 से घटकर महज तीन रह जाने के बाद अब सदन में उसकी मुखरता पर असर पड़ सकता है।
पहले भी कई प्रमुख सहयोगी पार्टी से किनारा कर चुके हैं जिनमें पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी और कवि कुमार विश्वास शामिल हैं।
वर्ष 2015 में, आम आदमी पार्टी की पूर्व प्रवक्ता शाजिया इल्मी ने पार्टी छोड़ दी और बाद में भाजपा में शामिल हो गईं। इसके बाद, पार्टी के भीतर भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर हुए तीखे सार्वजनिक विवाद के बाद वरिष्ठ नेता कपिल मिश्रा ने भी 2017 में पार्टी छोड़ दी। 2018 में, संस्थापक सदस्य आशीष खेतान ने व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए सक्रिय राजनीति से पूरी तरह से किनारा कर लिया। ये सभी बदलाव ऐसे समय में हुए, जब 'आप' पार्टी अपना विस्तार करने का प्रयास कर रही थी।
गुजरात, गोवा और पंजाब में होने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए, केजरीवाल के नेतृत्व वाली पार्टी के सामने तत्काल चुनौती अपने संगठन को बरकरार रखना, अपने नेतृत्व को फिर से संगठित करना और कार्यकर्ताओं को आश्वस्त करना है कि वह भी अपनी स्थापना से जुड़े सिद्धातों पर आगे बढ़ रही है।
भाषा सुभाष पवनेश
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