गाजियाबाद बलात्कार और हत्या मामले में महिला एसआईटी गठित करें उप्र के डीजीपी: न्यायालय
नरेश
- 24 Apr 2026, 05:50 PM
- Updated: 05:50 PM
नयी दिल्ली, 24 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को निर्देश दिया कि वह पिछले महीने गाजियाबाद में चार साल की बच्ची के साथ हुए बलात्कार और उसकी हत्या के मामले में समयबद्ध जांच के लिए किसी आयुक्त या महानिरीक्षक रैंक की अधिकारी के नेतृत्व में पूरी तरह से महिला अधिकारियों की एसआईटी का गठन करें।
न्यायालय ने पूर्व में प्रकरण में प्राथमिकी दर्ज करने और मामले की जांच के प्रति गाजियाबाद पुलिस की ''टालमटोल'' को लेकर चिंता जताई थी।
इसने निर्देश दिया कि विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन शुक्रवार को या शनिवार को पूर्वाह्न 11 बजे तक अधिसूचित किया जाए।
संबंधित घटना 16 मार्च को हुई थी जब एक पड़ोसी दिहाड़ी मजदूर की बेटी को कथित तौर पर चॉकलेट दिलाने के बहाने बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया। जब बच्ची वापस नहीं लौटी, तो उसके पिता ने उसकी तलाश शुरू की और बच्ची को खून से लथपथ एवं बेहोश पाया।
मामले में चौंकाने वाली बात यह रही कि जब बच्ची मिली थी तो वह जीवित थी, लेकिन दो निजी अस्पतालों ने कथित तौर पर उसका इलाज करने से इनकार कर दिया जिसके कारण बाद में गाजियाबाद जिला अस्पताल में उसकी मृत्यु हो गई।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने सिलसिलेवार कथित चूक और उदासीनता का कड़ा संज्ञान लेते हुए आदेश दिया कि एसआईटी में महिला पुलिस अधिकारी शामिल होंगी, जिनमें उत्तर प्रदेश कैडर की पुलिस आयुक्त या महानिरीक्षक रैंक की एक महिला अधिकारी भी शामिल होगी, लेकिन जिनका राज्य से कोई संबंध नहीं होगा।
इसने कहा कि एसआईटी में पुलिस अधीक्षक या अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक रैंक की महिला पुलिस अधिकारी और एक महिला पुलिस उपाधीक्षक या एक निरीक्षक शामिल होंगी।
पीठ ने निर्देश दिया कि एसआईटी बिना किसी देरी के जांच शुरू करे और अधिमानतः दो सप्ताह के भीतर जांच पूरी करने का प्रयास करे।
इसने कहा कि एसआईटी बच्ची के माता-पिता द्वारा की गई सभी शिकायतों की जांच करेगी, विशेष रूप से महत्वपूर्ण गवाहों की सुरक्षा के संबंध में, और दो निजी अस्पतालों - खजान सिंह मानवी हेल्थ केयर और सेंट जोसेफ (मरियम) अस्पताल की भूमिका की भी जांच करेगी, जिन्होंने कथित तौर पर बच्ची का इलाज करने से इनकार कर दिया।
पीठ ने कहा, ''जांच के परिणाम के आधार पर, आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।''
पूर्व में स्थानीय पुलिस के ''असंवेदनशील रवैये'' पर चिंता जता चुकी पीठ ने निचली अदालत को गाजियाबाद पुलिस द्वारा दायर आरोपपत्र के आधार पर मुकदमे की कार्यवाही आगे न बढ़ाने का भी निर्देश दिया।
पीठ ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि एसआईटी द्वारा पूरक आरोपपत्र दाखिल किए जाने तक कार्यवाही को स्थगित रखा जाए।
इसने कहा कि पूरक आरोपपत्र दाखिल करने के बाद एसआईटी उच्चतम न्यायालय के रजिस्ट्रार (न्यायिक) के समक्ष अनुपालन हलफनामा दाखिल करेगी।
शीर्ष अदालत ने बच्ची के पिता द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया, जिसमें मामले की अदालत की निगरानी में एसआईटी या सीबीआई से जांच कराने का अनुरोध किया गया था।
सुनवाई के दौरान, पुलिस की ओर से पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि इस मामले की सुनवाई संबंधित निचली अदालत में जारी है।
बच्ची के पिता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एन हरिहरन ने पुलिस के दावों का खंडन करते हुए कहा कि मृतका के पिता को बयान दर्ज कराने के लिए पुलिस द्वारा ''घसीटा'' गया था।
उन्होंने पूछा, ''अगर जांच पूरी हो चुकी है, तो वे (पुलिस) बच्ची के पिता का बयान धारा 164 (पूर्ववर्ती सीआरपीसी की) के तहत क्यों दर्ज कर रहे हैं?''
भाटी ने इस दावे का खंडन किया कि बच्ची के पिता को घसीटा गया था और कहा कि उनका बयान दर्ज किया जाना था।
हरिहरन ने कहा, ''क्या बयान दर्ज कराने के लिए उसे घसीटकर लाना जरूरी है? क्या वे यह दिखा सकते हैं कि उसे अदालत से कोई समन मिला है?''
उन्होंने दावा किया कि उन निजी अस्पतालों को बचाने का प्रयास किया गया जिन्होंने बच्ची का इलाज करने से इनकार कर दिया था, जिसके कारण उसकी मृत्यु हो गई।
याचिका का निपटारा करने वाली पीठ ने एसआईटी के गठन सहित कई निर्देश जारी किए।
याचिकाकर्ता ने मामले की निष्पक्ष और तटस्थ जांच का आग्रह किया था और मामले की जांच में स्थानीय पुलिस पर लापरवाही का आरोप लगाया था।
पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि उसे लगातार डर लगा रहता है और उसे निष्पक्ष मुकदमे की उम्मीद नहीं है।
यह उल्लेख करते हुए कि बच्ची के माता-पिता स्थानीय पुलिस द्वारा की गई जांच से असंतुष्ट हैं, पीठ ने टिप्पणी की कि अपराध की प्रकृति को देखते हुए, इस मामले पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का ध्यान जाना चाहिए था।
शीर्ष अदालत ने 10 अप्रैल को मामले की जांच में गाजियाबाद पुलिस के ''असंवेदनशील रवैये'' की कड़ी आलोचना की थी।
इसने गाजियाबाद के दो निजी अस्पतालों द्वारा खून से लथपथ बच्ची को भर्ती न किए जाने पर नाराजगी जताई थी, जिसे अंततः सरकारी अस्पताल में मृत घोषित कर दिया गया।
भाषा
नेत्रपाल नरेश
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