खुली जेलों के संबंध में उच्चतम न्यायालय के निर्देश को लागू करे दिल्ली सरकार: उच्च न्यायालय
रंजन
- 22 Apr 2026, 07:56 PM
- Updated: 07:56 PM
नयी दिल्ली, 22 अप्रैल (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को शहर के अधिकारियों से 'खुले सुधार गृहों' के लिए एक प्रोटोकॉल तैयार करने और वहां स्थानांतरित किये जा सकने वाले कैदियों की पहचान करने के संबंध में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों को लागू करने के लिए एक रणनीति तैयार करने को कहा।
मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने इस मुद्दे पर एक जनहित याचिका दायर की और 26 फरवरी को पारित शीर्ष न्यायालय के आदेश के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए कदमों का दिल्ली सरकार से विवरण मांगते हुए एक हलफनामा दाखिल करने को कहा।
अदालत ने कहा कि शीर्ष अदालत के निर्देशानुसार, प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को 'खुले सुधार गृहों' के प्रबंधन के लिए राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यकारी अध्यक्ष या उनके द्वारा नामित व्यक्ति की अध्यक्षता में एक निगरानी समिति का गठन करना होगा।
अदालत ने सरकारी वकील से कहा, ''कृपया गृह सचिव को सूचित करें कि उन्हें समिति का गठन करना चाहिए और उस समिति की बैठक हो तथा शीर्ष अदालत के आदेश को लागू करने के लिए विशिष्ट रणनीति तैयार की जाए। इसके अलावा, वर्तमान स्थिति का आकलन किया जाए।''
उच्च न्यायालय ने कहा, ''आपको उन कैदियों की पहचान करनी होगी जिन्हें खुली जेल में स्थानांतरित किया जा सकता है। ये सभी कार्य होने चाहिए। हम आपको दो महीने का समय दे रहे हैं।''
पीठ ने मामले की सुनवाई जुलाई महीने के लिए निर्धारित की और दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण से वस्तु स्थिति रिपोर्ट मांगी।
अदालत ने कहा कि निगरानी समिति को 'खुले सुधार गृहों' के उपयोग, कामकाज और विस्तार की देखरेख करनी होगी तथा जेलों में पात्र कैदियों की समय पर पहचान करने और सुधार गृहों में स्थानांतरण की सुविधा प्रदान करनी होगी।
अदालत ने केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, जेल अधिकारियों, दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण और उच्च न्यायालय प्रशासन को मामले में पक्षकार बनाया और वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद निगम को न्याय मित्र नियुक्त किया।
उच्चतम न्यायालय ने 26 फरवरी को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 'खुले सुधार गृहों' और खुली बैरकों में मौजूदा रिक्तियों को भरने के लिए एक समयबद्ध प्रोटोकॉल तैयार करने का निर्देश दिया था।
''अर्ध-खुली या खुली जेलें'' कैदियों को दिन के दौरान परिसर के बाहर काम करके आजीविका कमाने और शाम को वापस लौटने की अनुमति देती हैं। यह अवधारणा कैदियों को समाज में समाहित करने और उनके मनोवैज्ञानिक दबाव को कम करने के लिए शुरू की गई थी, क्योंकि उन्हें बाहर सामान्य जीवन जीने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
भाषा सुभाष रंजन
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2204 1956 दिल्ली