मप्र उच्च न्यायालय ने एएसआई को भोजशाला की वीडियोग्राफी विरोधी पक्ष के लिए अपलोड करने का निर्देश दिया
रंजन
- 22 Apr 2026, 01:13 AM
- Updated: 01:13 AM
इंदौर, 21 अप्रैल (भाषा) मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने मंगलवार को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को निर्देश दिया कि वह भोजशाला परिसर के अपने सर्वेक्षण का 'वीडियोग्राफिक रिकॉर्ड' अपलोड करे ताकि मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी सहित अन्य मौजूद वादी इसे देख सकें।
न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ मध्यप्रदेश के धार जिले के भोजशाला परिसर में एक विवादित ढांचे की धार्मिक प्रकृति को लेकर कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
इस मामले में हिंदुओं का मानना है कि यह ढांचा वाग्देवी या देवी सरस्वती का मंदिर है, जबकि मुसलमान इसे कमाल मौला मस्जिद कहते हैं।
मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने सर्वेक्षण से संबंधित वीडियोग्राफी पेश करने की मांग करने वाली याचिका पर वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए दलीलें दीं।
उन्होंने तर्क दिया कि एएसआई सर्वेक्षण रिपोर्ट पर आपत्तियां वीडियोग्राफिक रिकॉर्ड से उत्पन्न हो सकती हैं और इसलिए प्रतिवादी के पास इसकी पहुंच होनी चाहिए।
उन्होंने उच्चतम न्यायालय के एक आदेश का भी हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि उच्च न्यायालय को वीडियोग्राफी से होने वाली आपत्तियों पर विचार करना चाहिए।
याचिका का विरोध करते हुए, एएसआई के वकील ने कहा कि वीडियोग्राफी 96 दिनों तक चली, और फुटेज को साझा करने या प्रदर्शित करने में समय लगेगा। उन्होंने यह तर्क भी दिया गया कि उच्चतम न्यायालय के आदेश में उच्च न्यायालय द्वारा सामग्री को देखने पर विचार किया गया था।
हालांकि उच्च न्यायालय ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। पीठ ने एएसआई को निर्देश दिया कि वह सर्वेक्षण की कार्यवाही की पूरी वीडियोग्राफी को गूगल ड्राइव लिंक या समकक्ष क्लाउड-आधारित सेवा जैसे सुरक्षित डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड करे और प्रतिवादियों के वकीलों और अदालत दोनों तक पहुंच प्रदान करे। अदालत ने कहा कि यह प्रक्रिया 27 अप्रैल तक पूरी हो जानी चाहिए। मुख्य मामले की अगली सुनवाई 22 अप्रैल को होगी।
इससे पहले, एक हस्तक्षेपकर्ता के वकील ने सोमवार को उच्च न्यायालय को बताया कि हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस द्वारा दायर याचिका सुनवाई योग्य नहीं है, क्योंकि विवादित स्वामित्व के दावे और एक हल्के साक्ष्य के आधार इसे सिविल अदालतों का मामला बनाते हैं, न कि रिट अदालत के लिए।
हस्तक्षेप करने वाले की ओर से पेश हुए वकील अशर वारसी ने पीठ से आग्रह किया कि वह पक्षों को दीवानी सुनवाई या वक्फ न्यायाधिकरण की सुनवाई का निर्देश दे।
वारसी ने आधिकारिक नक्शे भी रिकॉर्ड पर रखे थे, जिसमें दिखाया गया था कि विवादित संपत्ति को 1925-26 में भू-राजस्व प्रविष्टियों में मस्जिद के रूप में दर्ज किया गया था।
उन्होंने कहा कि वक्फ अधिनियम, 1996 और 1985 के वक्फ सर्वेक्षण ने आपत्तियां दर्ज करने के लिए एक साल का समय प्रदान किया।
उन्होंने कहा कि वह खिड़की लंबे समय से बंद है, और प्रकाशन की तारीख से एक वर्ष से अधिक किसी भी मुकदमे पर विचार नहीं किया जा सकता है।
इस दावे के बारे में कि संरचना एक हिंदू मंदिर की पहचान करती है, वारसी ने इसके विपरीत मामला बनाने के लिए एएसआई की रिपोर्ट का हवाला दिया।
उन्होंने कहा कि मंदिर की आवश्यक विशेषताएं - गर्भ गृह, शिखर, मंडप, अंतराला, गोपुरम - अनुपस्थित हैं और जो मौजूद है वह मिहराब, किबला संरेखण, साहन (खुला आंगन) और मीनार जैसे स्पष्ट मस्जिद तत्व हैं।
उन्होंने एएसआई निदेशक द्वारा साइट पर भोज उत्सव आयोजित करने के अनुरोध को अस्वीकार करने का भी उल्लेख किया, जिसमें निदेशक ने कहा कि केवल नमाज की अनुमति दी जा सकती है।
वकील ने दलील दी कि ब्रिटिश म्यूजियम के दस्तावेज के अनुसार, संग्रहालय में रखी गई वागदेवी की प्रतिमा की उत्पत्ति भोजशाला से नहीं बल्कि परमार युग के सिटी पैलेस के खंडहरों से देखी जा सकती है।
एएसआई की रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि मौजूदा संरचना परमार युग के एक हिंदू मंदिर के अवशेषों का उपयोग करके बनाई गई थी।
भाषा सं ब्रजेन्द्र रंजन
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2204 0113 इंदौर