धार्मिक परंपराओं पर रोक लगाने की सरकार की शक्ति की अदालत कर सकती है पड़ताल : उच्चतम न्यायालय
दिलीप
- 21 Apr 2026, 09:56 PM
- Updated: 09:56 PM
नयी दिल्ली, 21 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति पर सीमाओं के बावजूद, वह इस बात की पड़ताल कर सकता है कि क्या सरकार सामाजिक कल्याण या सुधार के नाम पर किसी धार्मिक परंपरा या रीति-रिवाज पर प्रतिबंध लगा सकती है।
धार्मिक परंपराओं से जुड़े मामलों में अदालत को हस्तक्षेप करने से रोकने के लिए दी गई जोरदार दलीलों पर विचार करते हुए, प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में न्यायिक समीक्षा की (उच्चतम) न्यायालय की शक्ति पर कुछ सीमाएं हैं, लेकिन यह कहना कि इस संबंध में कोई अधिकार नहीं है, ''स्वीकार करना मुश्किल होगा।''
पीठ में न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, न्यायाधीश एमएम सुंदरेश, न्यायाधीश अहसानुद्दीन अमानुल्ला, न्यायाधीश अरविंद कुमार, न्यायाधीश ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायाधीश प्रसन्ना बी वराले, न्यायाधीश आर महादेवन और न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं।
ये टिप्पणियां पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता जे साई दीपक की दलीलों पर कीं, जो पंडालम शाही परिवार और ऐतिहासिक श्रीउर मठ की ओर से अदालत में पेश हुए थे।
यह दलील दी गई कि यदि कोई धार्मिक परंपरा अपने पवित्र स्वरूप के कारण स्वाभाविक रूप से न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर है, तो सरकार द्वारा किसी कानून के माध्यम से उस परंपरा को मान्यता देने या ''संहिताबद्ध'' करने मात्र से न्यायपालिका को उसकी समीक्षा करने की शक्ति अचानक प्राप्त नहीं हो जाती।
प्रधान न्यायाधीश ने उनसे कहा, ''यदि सरकार सामाजिक कल्याण के नाम पर किसी धार्मिक परंपरा पर प्रतिबंध लगाती है, तो इसकी पड़ताल कौन करेगा? हमारा मानना है कि कुछ सीमाएं हैं, लेकिन यह कहना कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति बिल्कुल नहीं है, यह बात स्वीकार करना बहुत कठिन हो सकता है। न्यायिक समीक्षा की शक्ति पर इतना हमला करने की कोई आवश्यकता नहीं है।''
दीपक अदालत में चेतना कन्साइंस ऑफ वुमन, भगवान अय्यप्पा मंदिरों के अखिल भारतीय संगठन, साथ ही श्री पद्मनाभस्वामी और चिलकुर बालाजी मंदिरों के मुख्य पुजारियों जैसे विभिन्न अन्य हिंदू संगठनों का भी प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जो काम सीधे तौर पर नहीं किया जा सकता, वह अप्रत्यक्ष रूप से भी नहीं किया जा सकता।
वकील ने पीठ से कहा कि किसी कानून का इस्तेमाल अदालतों द्वारा सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं की ''तर्कसंगतता'' का परीक्षण करने के लिए पिछले दरवाजे के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।
इससे पहले दिन में, न्यायालय ने शबरिमला अयप्पा मंदिर के मुख्य पुजारी से पूछा कि क्या संविधान उस श्रद्धालु की रक्षा नहीं करेगा, जिसे मूर्ति छूने की अनुमति नहीं है।
शीर्ष न्यायालय की यह टिप्पणी मुख्य पुजारी के उस बयान के बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि जब कोई श्रद्धालु पूजा के लिए मंदिर जाता है, तो यह किसी देवता की विशेषताओं के विरोध में नहीं हो सकता।
नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ केरल के शबरिमला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और विभिन्न आस्थाओं को मानने वाले लोगों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमा से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई कर रही है।
मंगलवार को सुनवाई का छठा दिन था, जो बुधवार को भी होगी।
भाषा सुभाष दिलीप
दिलीप
2104 2156 दिल्ली