न्यायालय ने दिल्ली सरकार को विवादित पितृत्व वाली बच्ची की देखभाल का निर्देश दिया
पवनेश
- 21 Apr 2026, 09:38 PM
- Updated: 09:38 PM
नयी दिल्ली, 21 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने विवादित पितृत्व वाली एक बच्ची के भविष्य को लेकर चिंता जताते हुए मंगलवार को दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह बच्ची का न्यूनतम जीवन स्तर बनाए रखने के लिए आवश्यक बुनियादी वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करे।
उच्चतम न्यायालय दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाली एक महिला की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें कहा गया था कि उसकी बेटी भरण-पोषण की हकदार नहीं है।
इस मामले में, महिला ने तीन साल तक एक व्यक्ति के यहां घरेलू सहायिका के रूप में काम किया, जिसके दौरान उसने शादी का झांसा देकर महिला के साथ यौन संबंध स्थापित किए। अंततः दोनों ने मार्च 2016 में शादी कर ली और एक बच्ची का जन्म हुआ।
दोनों के वैवाहिक संबंध शीघ्र ही बिगड़ गए, जिसके बाद 14 जुलाई, 2016 को घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005 के तहत शिकायत दर्ज कराई गई। शिकायत में अन्य राहतों के साथ-साथ 25,000 रुपये प्रति माह के अंतरिम भरण-पोषण की मांग की गई।
इस आवेदन के जवाब में, पुरुष ने बच्ची का पितृत्व स्थापित करने के लिए डीएनए परीक्षण कराने की प्रार्थना की और साथ ही घरेलू हिंसा के सभी आरोपों को निराधार बताया।
निचली अदालत ने डीएनए परीक्षण का आदेश दिया, जिससे पता चला कि वह व्यक्ति बच्ची का जैविक पिता नहीं था। अदालत ने बाद में आवेदन खारिज कर दिया, जिसे अपीलीय अदालत ने बरकरार रखा।
बाद में, दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील दायर की गई, जिसने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 112 पर विचार करते हुए कहा कि इस धारा का संरक्षण महिला को तभी मिलता जब डीएनए परीक्षण नहीं किया गया होता।
चूंकि डीएनए रिपोर्ट रिकॉर्ड में थी, इसलिए उच्च न्यायालय ने बच्ची को भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया। महिला के भरण-पोषण के संबंध में, उच्च न्यायालय ने माना कि निचली अदालत ने अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार करने में गलती की थी। इसने मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए निचली अदालत को वापस भेज दिया।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की उच्चतम न्यायालय की पीठ ने कहा कि बेटी को भरण-पोषण देने से इनकार करने के उच्च न्यायालय के फैसले में कोई त्रुटि नहीं थी।
बच्ची के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता के भरण-पोषण के मामले को निचली अदालत द्वारा नए सिरे से निर्णय के लिए वापस भेजने का सही फैसला किया है। हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि कानून के अनुसार संशोधित राशि दिए जाने पर भी बच्ची की मुश्किलें बनी रहेंगी।
पीठ ने कहा कि बच्ची की सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करने के हित में, दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकास सचिव को निर्देश दिया जाता है कि वे किसी अनुभवी व्यक्ति को नियुक्त करें जो अपीलकर्ता के निवास स्थान का विवरण प्राप्त करे और वहां जाकर बच्ची की स्थिति का जायजा ले, जिसमें शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य और न्यूनतम जीवन स्तर बनाए रखने के लिए आवश्यक बुनियादी वस्तुओं की उपलब्धता शामिल है।
भाषा अविनाश पवनेश
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