गोदरेज प्रॉपर्टीज विकास प्रबंधन के लिए गोदरेज एंड बॉयस से शुल्क लेगी
प्रेम रमण
- 03 May 2024, 07:52 PM
- Updated: 07:52 PM
नयी दिल्ली, तीन मई (भाषा) जमशेद गोदरेज और उनकी बहन के नियंत्रण वाली कंपनी गोदरेज एंड बॉयस के पास समूह के विशाल भूमि बैंक का नियंत्रण होगा जबकि आदि गोदरेज और नादिर गोदरेज के नेतृत्व वाला दूसरा धड़ा प्रबंधन शुल्क के एवज में रियल एस्टेट परियोजनाओं का विपणन करेगा।
गोजरेज समूह के विशाल भूमि बैंक में मुंबई के उत्तर-पूर्वी इलाके में स्थित 3,000 एकड़ जमीन भी शामिल है।
जमीन मालिक एवं डेवलपर गोदरेज एंड बॉयस और विकास प्रबंधक गोदरेज प्रॉपर्टीज ने मंगलवार को घोषणा की थी कि दोनों कंपनियां मुंबई के विक्रोली में स्थित विशाल भूखंड के विकास के लिए समय-समय पर निष्पादित अपने समझौता ज्ञापनों (एमओयू) को बरकरार रखेंगी।
गोदरेज प्रॉपर्टीज के कार्यकारी चेयरमैन पिरोजशा गोदरेज ने शुक्रवार को वित्त वर्ष 2023-24 के वित्तीय परिणामों की घोषणा के बाद पीटीआई-भाषा से कहा कि कंपनी रियल एस्टेट परियोजनाओं के लिए विकास प्रबंधक रही है और वही व्यवस्था आगे भी जारी रहेगी।
पिरोजशा ने कहा, "गोदरेज प्रॉपर्टीज संपत्ति का विकास प्रबंधक होगी और गोदरेज एंड बॉयस मालिक एवं डेवलपर होगी। हमें परियोजना के विपणन में भूमिका के लिए विकास प्रबंधन शुल्क मिलेगा और यह परियोजना राजस्व का 10 प्रतिशत होगा।"
उन्होंने कहा कि विकास प्रबंधन (डीएम) मॉडल के तहत मुंबई में दो परियोजनाएं - गोदरेज प्लैटिनम और गोदरेज विस्टास शुरू की गई हैं। विकास प्रबंधन मॉडल के तहत निर्माण लागत का बोझ डेवलपर उठाता है।
पिरोजशा ने विकास प्रबंधन साझेदारी के तहत कई और परियोजनाएं मिलने की उम्मीद जताई लेकिन उन्होंने क्षेत्र के साथ-साथ बिक्री मूल्य के संदर्भ में कुल भूमि बैंक और विकास क्षमता पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।
कुछ अनुमानों के मुताबिक, जीएंडबी के स्वामित्व वाले इलाके विक्रोली में 3,000 एकड़ जमीन में एक लाख करोड़ रुपये से अधिक की विकास क्षमता है। यहां की करीब 1,000 एकड़ भूमि पर ही विकास कार्य हो सकते हैं क्योंकि 1,750 एकड़ भूमि में मैंग्रोव वन हैं और करीब 300 एकड़ जमीन पर अवैध कब्जा हो चुका है।
विक्रोली संपत्ति को गोदरेज समूह के संस्थापक अर्देशिर गोदरेज के छोटे भाई पिरोजशा गोदरेज ने 1941-42 में बॉम्बे उच्च न्यायालय रिसीवर से सार्वजनिक नीलामी में खरीदा था। पहले इसका स्वामित्व एक पारसी व्यापारी फ्रामजी बानाजी के पास था, जिन्होंने इसे 1830 के दशक में ईस्ट इंडिया कंपनी से खरीदा था।
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