दुनिया में निष्क्रियता की वजह से जलवायु परिवर्तन के लिहाज से स्थिति खराब हो रही है : जिम स्की
धीरज नरेश
- 11 Mar 2025, 06:41 PM
- Updated: 06:41 PM
(गौरव सैनी)
नयी दिल्ली, 11 मार्च (भाषा)जलवायु परिवर्तन के असर अपेक्षा से अधिक तेजी से सामने आ रहे हैं और वैज्ञानिक तापमान वृद्धि की गति से हतप्रभ हैं। यह कहना है संयुक्त राष्ट्र के जलवायु विज्ञान समिति के अध्यक्ष जिम स्की का।
जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी समिति (आईपीसीसी) के अध्यक्ष जिम स्की ने टेरी के विश्व सतत विकास शिखर सम्मेलन के अवसर पर ‘पीटीआई-भाषा’ को दिये साक्षात्कार में कहा कि जलवायु परिवर्तन पर निष्क्रियता के कारण विश्व तीन वर्ष पहले की तुलना में बदतर स्थिति में है।
उन्होंने कहा, ‘‘यदि आप पिछले पांच वर्षों पर नजर डालें, तो मुझे लगता है कि वैज्ञानिक इस बात से हतप्रभ हैं कि वैश्विक स्तर पर तापमान में कितनी तेजी से वृद्धि हुई है और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की प्रकृति कितनी स्पष्ट है, जिसे हम पहले ही देख चुके हैं... विश्व के कुछ भागों में जंगलों में आग लगना, बाढ़ आना तथा अन्य चरम घटनाएं इनमें शामिल हैं।’’
स्की ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘ऐसा प्रतीत होता है कि चीजें शायद लोगों की अपेक्षा से भी अधिक तेजी से घटित हो रही हैं।’’
वर्ष 2024 सबसे गर्म वर्ष था और यह पहला ऐसा वर्ष था जिसमें वैश्विक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया था। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार, पिछला दशक (2015-2024) दस्तावेज में दर्ज किये गए 10 सबसे गर्म वर्ष थे।
उन्होंने कहा कि आईपीसीसी का 2019 के स्तर से 2030 तक 43 प्रतिशत उत्सर्जन कटौती का लक्ष्य अब निष्क्रियता के कारण पुराना हो चुका है। इसका अभिप्राय है कि वास्तव में और अधिक आवश्यक कटौती की जरूरत है।
स्की ने कहा, ‘‘उत्सर्जन में 43 प्रतिशत कटौती का लक्ष्य अब लगभग तीन साल पुराना हो चुका है और चूंकि हमने इस बीच कोई कार्रवाई नहीं की है, इसलिए इसमें बदलाव हो सकता है। यदि आप नई जानकारी लेकिन उन्हीं तरीकों का उपयोग करके इसकी पुनर्गणना करें, तो यह संख्या संभवतः भिन्न होगी। इसलिए, हम वास्तव में तीन साल पहले की तुलना में बदतर स्थिति में हैं, जब यह आकलन तैयार किया गया था।’’
आईपीसीसी की 2022 में प्रकाशित छठी मूल्यांकन रिपोर्ट (एआर6) - कार्य समूह-3 में कहा गया है कि औद्योगिक क्रांति की शुरुआत के बाद से औसत वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को 2030 तक (2019 के स्तर की तुलना में) 43 प्रतिशत कम किया जाना चाहिए।
स्की से जब पूछा गया कि सरकारें तत्परता से कार्य क्यों नहीं कर रही हैं तो उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों ने जलवायु कार्रवाई की तात्कालिकता को स्पष्ट कर दिया है, लेकिन समाधान को लागू करना नीति निर्माताओं पर निर्भर है।
आईपीसीसी अध्यक्ष ने कहा, ‘‘ वैज्ञानिक कभी-कभी ऐसी बातें कह देते हैं जो समझ से परे या समझने में कठिन होती हैं। मुझे लगता है कि हमारे संदेश बिल्कुल स्पष्ट हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हमने उपलब्ध उपायों, नवीकरणीय ऊर्जा सहित अन्य विकल्पों, भूमि उपयोग के स्वरूप में बदलाव आदि के बारे में बताया है, ये सभी चीजें उत्सर्जन में वृद्धि को रोकने में योगदान कर सकती हैं। मेरा मानना है कि आप कई चीजों के लिए वैज्ञानिकों को दोषी ठहरा सकते हैं, लेकिन कार्रवाई न होने के लिए नहीं।’’
स्की ने कहा कि समस्या वैज्ञानिक संदेश नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक और राजनीतिक कारक हैं जो सार्वजनिक और नीतिगत निर्णयों को प्रभावित करते हैं।
आईपीसीसी अध्यक्ष से पूछा गया कि क्या वैज्ञानिक लोगों को यह समझाने में असफल रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन वास्तविक है? इस पर उन्होंने कहा कि कई लोग जलवायु नीतियों का विरोध करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ये उन पर थोपी गई हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘मुझे नहीं लगता कि हम वास्तव में अपना काम करने में विफल रहे हैं... जलवायु कार्रवाई अन्य सामाजिक परिवर्तनों, अन्य चल रही चीजों के संदर्भ में होती है। हमने रिपोर्ट में जो संदेश दिये हैं, जिस पर शायद उतना ध्यान नहीं दिया गया है, वह यह है कि हमें जलवायु परिवर्तन कार्रवाई में समाज और लोगों को अपने साथ जोड़ना होगा।’’
स्की ने कहा, ‘‘जलवायु परिवर्तन संबंधी कार्रवाई ऐसी चीज नहीं होनी चाहिए जिसे लोगों पर ऊपर थोपा जाए और जलवायु परिवर्तन संबंधी नीतियों के प्रति हमें जो प्रतिक्रिया मिल रही है, वह इसलिए आ रही है क्योंकि आम लोगों को ऐसा लग रहा है कि उन्हें चीजें करने के लिए, बदलाव के लिए मजबूर किया जा रहा है।’’
आईपीसीसी की रिपोर्ट में ‘ग्लोबल साउथ’ (दुनिया के विकासशील देशों के संदर्भ में)के प्रति पक्षपात के आरोप लगते हैं। इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक साहित्य का तेजी से विस्तार विकासशील देशों की ओर हो रहा है।
उन्होंने कहा, ‘‘(जबकि) हमारे पास ऐतिहासिक रूप से उत्तर में (विकसित देशों में)मजबूत वैज्ञानिक संस्थान रहे हैं, लेकिन अब यह तस्वीर बदल रही है। प्रत्येक आईपीसीसी चक्र में जलवायु संबंधी प्रकाशनों में प्रति वर्ष लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि होती है और हमारे द्वारा मूल्यांकन किए जाने वाले साहित्य की मात्रा लगभग दोगुनी हो रही है। इस वृद्धि का अधिकांश हिस्सा विकासशील देशों में हो रहा है, जिसमें यूरोप और चीन जलवायु परिवर्तन पर नए प्रकाशित शोध के सबसे बड़े स्रोतों में से हैं।’’
भाषा धीरज