राज्यसभा में विपक्षी दलों ने सरकार पर शिक्षा का निजीकरण करने, सांप्रदायिकता परोसने का आरोप लगाया
ब्रजेन्द्र ब्रजेन्द्र मनीषा
- 11 Mar 2025, 05:51 PM
- Updated: 05:51 PM
नयी दिल्ली, 11 मार्च (भाषा) विपक्षी दलों ने मंगलवार को सरकार पर शिक्षा का निजीकरण करने, शिक्षण संस्थानों में एक विचारधारा विशेष के लोगों को भरने, एनसीईआरटी की किताबों में सांप्रदायिकता परोसने और विरोधी विचारधारा वाले दलों के नेतृत्व वाली राज्य सरकारों का केंद्रीय हिस्सा रोककर उनके साथ भेदभाव बरतने का आरोप लगाया।
राज्यसभा में शिक्षा मंत्रालय के कामकाज पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए विपक्षी दलों के सदस्यों ने शिक्षा को समाज के निर्माण का मुख्य आधार करार दिया और दावा किया कि सरकार द्वारा इसे नजरअंदाज किए जाने की वजह से यह आधार कभी मजबूत नहीं हो पाया।
उन्होंने कहा कि इस वजह से बच्चों का बीच में पढ़ाई छोड़ना, स्कूलों में शिक्षकों, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं अवसंरचना का अभाव तथा पर्चे लीक होना जैसी समस्याएं दूर होने के बजाय बढ़ती जा रही हैं।
कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने चर्चा की शुरुआत करते हुए दावा किया कि नयी शिक्षा नीति लोगों को निजी शिक्षा लेने के लिए मजबूर कर रही है।
उन्होंने कहा कि पहले सरकारी विश्वविद्यालयों से कोई कर नहीं लिया जाता था किंतु अब उनसे 18 प्रतिशत जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) लिया जाता है।
उन्होंने दावा किया कि शिक्षा को बेचने के अलावा नयी शिक्षा नीति कुछ नहीं है।
सिंह ने कहा कि भारत सांप्रदायिक सद्भाव और अनेकता में एकता का उदाहरण है किंतु उन्हें यह कहते हुए अफसोस हो रहा है कि एनसीईआरटी की कुछ पुस्तकों में सांप्रदायिकता के संकेत नजर आते हैं।
उन्होंने दावा किया कि इतिहास को नये ढंग से प्रस्तुत करने के प्रयास हो रहे हैं।
कांग्रेस सदस्य ने कहा कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद जो कुछ हुआ, उसे पाठ्यक्रम से निकाल दिया गया।
उन्होंने केंद्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों में शिक्षकों के पद खाली होने की ओर भी सदन का ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि केंद्रीय विद्यालयों में 7,414 पद और नवोदय विद्यालयों में 4,022 पद खाली हैं।
सिंह ने कहा कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में भी 5,410 पद खाली हैं और यहां भी संविदा के आधार पर भर्ती की जा रही है।
उन्होंने कहा कि यह कुछ और नहीं, पर्दे के पीछे से अपने लोगों को भरने की ‘कुटिल योजना या प्रयास’ है।
सिंह ने कहा कि पीएमश्री विद्यालयों के लिए जिन राज्य सरकारों ने समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किये, उनका समग्र शिक्षा अभियान के तहत कोष रोक दिया गया। उन्होंने कहा, ‘‘यह हमारे संवैधानिक अधिकारों का हनन है। पश्चिम बंगाल के 1000 करोड़ रूपये, केरल के 859 करोड़ रूपये और तमिलनाडु के 2192 करोड़ रूपये रोक दिये गये हैं।’’
कांग्रेस के ही इमरान प्रतापगढ़ी ने दावा किया कि एनसीईआरटी की किताबों में हिंदू-मुस्लिम एकता के अध्याय हटाए जा रहे हैं और एक नया इतिहास पढ़ाने के चक्कर में बच्चों को गुमराह करके झूठा इतिहास पढ़ने का प्रयास किया जा रहा है।
उन्होंने शिक्षा और धर्म को एक दूसरे से अलग रखने पर जोर दिया और कहा कि देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों को ‘बदनाम’ करने के लिए जो तरीका सरकार इस्तेमाल कर रही है, वह ‘बहुत शर्मनाक’ है।
उन्होंने सरकार से आग्रह किया, ‘‘शांति स्थापित करने के लिए आप भाषण मत दीजिए, अशांति फैलाना बंद कर दीजिए। शांति अपने आप स्थापित हो जाएगी। प्रेम फैलाने पर लंबे-लंबे लेख मत लिखिए, बस, नफरत करना बंद कर दीजिए। प्रेम अपने आप फैल जाएगा’’
प्रतापगढ़ी ने महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे की प्रशंसा करने वाली एनआईटी कालीकट की एक प्रोफेसर को डीन बनाए जाने का भी उल्लेख किया और सरकार पर निशाना साधा।
तृणमूल कांग्रेस के रीताव्रता बनर्जी ने कहा कि शिक्षा समाज के निर्माण का मुख्य आधार है लेकिन दुर्भाग्य से सबके लिए शिक्षा का लक्ष्य देश में आज तक पूरा नहीं हो पाया ।
बनर्जी ने कहा कि राज्य विश्वविद्यालयों को अपनी जरूरतों के अनुसार काम करने की छूट दी जानी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं होता और राजनीतिक प्रतिशोध विपक्ष शासित राज्यों में हावी हो जाता है। उन्होंने कहा कि कुलपतियों की नियुक्ति में राज्य सरकार को उपेक्षित कर दिया जाता है।
उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार, विपक्ष शासित राज्य सरकारों को विभिन्न शिक्षा मदों की केंद्रीय राशि भी समय पर जारी नहीं करती और पश्चिम बंगाल इसका उदाहरण है। ‘‘हमारा समग्र शिक्षा का कोष बार बार अनुरोध के बावजूद आज तक जारी नहीं किया गया। यह सहकारी संघवाद की भावना का पूरी तरह से उल्लंघन है।’’
बनर्जी ने अल्पसंख्यक संस्थानों का जिक्र करते हुए कहा कि आज करीब 54,000 संस्थान देश में ईसाई संगठनों द्वारा चलाए जाते हैं जिनमें सात लाख विद्यार्थी पढ़ते हैं जो हर वर्ग के हैं। ‘‘लेकिन ये संस्थान सरकार के निशाने पर रहते हैं।’’
द्रमुक सदस्य डॉ एनवीएन कनिमोझी शोमू ने कहा कि तमिलनाडु नयी शिक्षा नीति का विरोध कर रहा है क्योंकि केंद्र इसके माध्यम से हिंदी और संस्कृत थोपने की कोशिश कर रहा है।
उन्होंने कहा, ‘‘तमिलनाडु की दो भाषा नीति में कोई बदलाव नहीं होगा।’’
शोमू ने कहा, ‘‘सच्ची प्रगति नवाचार में निहित है न कि भाषा थोपने में। कृत्रिम मेधा (एआई) के युग में स्कूलों में किसी भी भाषा को तीसरी भाषा के रूप में थोपना अनावश्यक है। हम अपनी दो भाषा की नीति पर कायम हैं और 1940 से तमिलनाडु हिंदी का विरोध करता आ रहा है। लेकिन इसे हम पर थोपा जा रहा है। यह न केवल हास्यास्पद है बल्कि असंवैधानिक भी है।’’
वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के गोला बाबू राव ने कहा कि शिक्षा को लेकर बड़े बड़े दावों की असलियत यही है कि आजादी के इतने साल बाद हम आज संसद में शिक्षा पर चर्चा कर रहे हैं और हमारे युवा बेरोजगार हैं।
उन्होंने कहा ‘‘कई स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, अगर हैं तो वहां अवसंरचना नहीं है, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल रही है, पर्चे लीक हो रहे हैं। यह सब क्या है? अगर अभी भी हम दलीय राजनीति से ऊपर उठ कर नहीं सोचेंगे तो यह चर्चा बेमानी होगी। विकसित भारत की कल्पना तो बहुत दूर की बात है। ’’
राव ने कहा कि पाठ्यक्रम बदलने से कुछ नहीं होगा और न ही विश्वविद्यालयों में पसंदीदा कुलपतियों की नियुक्ति से कुछ होगा।
राष्ट्रीय जनता दल के मनोज कुमार झा ने आरोप लगाया कि अब शिक्षा संस्थान दक्षिणपंथी वैचारिक रुझानों का अड्डा बनते जा रहे हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘यह सोचना होगा कि शिक्षा उद्योग कतई नहीं है, हां, इसमें निवेश जरूरी है ताकि इसे बढ़ावा दिया जा सके।’’
औरंगजेब को लेकर चल रहे विवाद का परोक्ष संदर्भ देते हुए झा ने कहा ‘‘इतिहास के बासी पन्नों में जा कर अगर हम आज की चुनौतियों को नजरअंदाज करेंगे तो इतिहास के बासी पन्नों के नायक किसी भी समस्या के हल में हमारी कोई मदद नहीं करेंगे।’’
समाजवादी पार्टी के जावेद अली खान ने कहा कि जीडीपी का 6 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा के क्षेत्र में खर्च किए जाने का दावा किया जाता है लेकिन आज भी हम 2.5 प्रतिशत पूरे तरीके से खर्च नहीं कर पाते हैं।
उन्होंने कहा कि केंद्रीय विश्वविद्यालय और केंद्र की संस्थाओं में बहुत बुरी स्थिति है और इनमें नियुक्तियां भी पूरी नहीं हो पा रही हैं।
उन्होंने कहा करीब 33 प्रतिशत पद खाली हैं और इसका सीधा असर आरक्षण पर पड़ रहा है।
भाषा ब्रजेन्द्र ब्रजेन्द्र