जिस जमीन से दलित परिवारों को बेदखल करने की कोशिश की जा रही है, वह केरल सरकार की है: माकपा
संतोष नरेश रवि कांत
- 22 May 2026, 08:45 PM
- Updated: 08:45 PM
कोच्चि, 22 मई (भाषा) मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने शुक्रवार को दावा किया कि किझक्कंबलम के पास परियाथुकावु में जिस विवादित भूमि पर कई दलित परिवार दशकों से रह रहे हैं, वह सरकारी भूमि है और पार्टी उन्हें क्षेत्र से हटाने के किसी भी प्रयास का विरोध करेगी।
माकपा नेताओं, राज्य की पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री आर बिंदु और पूर्व विधायक पी वी श्रीनिजिन ने दलित बस्ती का दौरा किया और पत्रकारों को बताया कि लगभग 2.5 एकड़ का विवादित क्षेत्र 19 एकड़ सरकारी भूमि का हिस्सा है।
उन्होंने यह भी दावा किया कि सरकार को दो निजी व्यक्तियों के बीच 2.5 एकड़ भूमि के स्वामित्व को लेकर चल रहे मुकदमे की जानकारी नहीं थी।
उन्होंने दावा किया कि 2022-23 में एक निजी व्यक्ति के पक्ष में उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद एक मुंसिफ अदालत ने तहसीलदार को दलित परिवारों को बेदखल करने का निर्देश दिया और तभी सरकार को इस मामले की जानकारी मिली।
श्रीनिजिन ने यह भी आरोप लगाया कि दलित परिवारों को बेदखल करने की कोशिश कर रहे अधिवक्ता आयोग के प्रमुख 'पक्षपातपूर्ण' तरीके से काम कर रहे हैं।
बिंदु ने तर्क दिया कि चूंकि दलित परिवारों के पास सर्वोच्च न्यायालय तक जाने के लिए पैसे नहीं हैं, इसलिए वे आदेश को चुनौती नहीं दे सकते।
दोनों का मानना था कि मौजूदा संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दलित परिवार उस क्षेत्र में रहना जारी रख सकें, क्योंकि उन्हें पानी और बिजली के कनेक्शन दिए गए हैं और वे दशकों से उस स्थान पर रह रहे हैं।
बिंदु ने दावा किया कि अतीत में दलित परिवारों को बेदखल करने के 14 प्रयास असफल रहे क्योंकि वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) सत्ता में था और पुलिस ने हिंसा का सहारा नहीं लिया था।
उन्होंने कहा, ''हालांकि यूडीएफ के सत्ता में आते ही पुलिस के व्यवहार में बदलाव आ गया, क्योंकि उसने महिलाओं के खिलाफ हिंसा का इस्तेमाल किया और परिवारों को बलपूर्वक बेदखल करने की कोशिश की। यह निंदनीय है।''
उन्होंने यह भी दावा किया कि एलडीएफ सरकार ने इस मामले को सुलझाने के लिए कई बार चर्चा की है।
श्रीनिजिन ने दावा किया कि वाम सरकार ने 19 एकड़ जमीन के सर्वेक्षण के लिए केरल उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी और न्यायालय ने जिला कलेक्टर को यह सर्वेक्षण करने का निर्देश दिया था।
उन्होंने कहा, ''विवादित जमीन पर मालिकाना हक जताने वाले निजी व्यक्ति को अपने दावे के समर्थन में दस्तावेज पेश करने के लिए नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं आया।''
उन्होंने निजी व्यक्ति को जमीन का दूसरा टुकड़ा देने और दलित परिवारों को वहीं रहने देने की सिफारिश की, जहां वे अभी रह रहे हैं।
बृहस्पतिवार को एक मुंसिफ अदालत ने पुलिस को 23 मई तक बेदखली की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया।
लेकिन बेदखली अभियान हिंसक हो गया क्योंकि निवासियों ने आयोग के क्षेत्र में प्रवेश करने के प्रयास का विरोध किया, जिसके चलते पुलिस को प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पानी की बौछार का प्रयोग करना पड़ा और कई लोगों को गिरफ्तार करना पड़ा।
पुलिस ने बाद में 50 पहचाने गए व्यक्तियों के खिलाफ मामला भी दर्ज किया, जिन पर लोक सेवकों को उनके कर्तव्यों का निर्वहन करने से रोकने का आरोप है।
राज्य के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने बेदखली अभियान से संबंधित पुलिस कार्रवाई की व्यापक जांच के निर्देश दिए हैं।
प्रभावित दलित परिवारों ने अपने निष्कासन के खिलाफ अपील की है, लेकिन हर बार अदालतों ने उनकी याचिकाएं खारिज कर दीं। उन्होंने दावा किया है कि जिस जमीन पर वे रह रहे हैं वह सरकारी जमीन है, निजी स्वामित्व वाली नहीं है।
भाषा
संतोष नरेश रवि कांत
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