ममता के कड़े विरोध, चुनावों में बड़ी जीत की बदौलत मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे शुभेंदु अधिकारी
धीरज
- 09 May 2026, 08:36 PM
- Updated: 08:36 PM
(फोटो के साथ)
कोलकाता, नौ मई (भाषा) नंदीग्राम में राजनीतिक जद्दोजहद का सामना करके शनिवार को पश्चिम बंगाल के नए संभावित सचिवालय राइटर्स बिल्डिंग में मुख्यमंत्री पद पर आसीन होने तक शुभेंदु अधिकारी ने सियासत में फर्श से अर्श तक पहुंचने का चुनौतीपूर्ण सफर तय किया। वर्षों के विद्रोह, पाला बदल और जूझारु व्यक्तित्व के दम पर उन्होंने राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदलकर रख दिया।
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल आर. एन. रवि ने कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में एक भव्य समारोह में शुभेंदु अधिकारी को राज्य के नौवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई। वह पश्चिम बंगाल में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री भी हैं।
शुभेंदु के शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) शासित राज्यों के मुख्यमंत्री, बंगाल भाजपा के नेता, लाखों उत्साहित समर्थक और आम लोग शामिल हुए।
शुभेंदु अधिकारी कई वजहों से मुख्यमंत्री पद के हकदार माने जाते रहे। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी को पांच साल के अंतराल में दो बड़े चुनावी झटके दिए। पहली बार 2021 के विधानसभा चुनाव में उनका गढ़ कहलाने वाले नंदीग्राम में। दूसरी बार 2026 के विधानसभा चुनावों में ममता का "अभेद्य" गढ़ माने जाने वाले भवानीपुर में।
एक समय में ममता के सबसे करीबी सहयोगियों में शुमार शुभेंदु आज उनके लिए संभवत: सबसे दुर्जेय प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरे हैं। इस प्रक्रिया में उन्होंने न केवल अपने सियासी भविष्य को नया आकार दिया, बल्कि शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का विश्वास भी जीता।
बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में शुभेंदु अधिकारी का उभरना उनकी आक्रामक शैली और कानून-व्यवस्था, घुसपैठ और तृणमूल कांग्रेस के शासन में "भ्रष्टाचार" जैसे मुद्दों पर उनके मजबूत रुख पर आधारित है।
उन्होंने अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन का अधिकांश समय मुख्य रूप से कृषि प्रधान पूर्व मेदिनीपुर जिले के तटीय और औद्योगिक क्षेत्रों में दबदबा कायम करने में बिताया। हालांकि, 2020 में वह तृणमूल कांग्रेस से अलग हो गए।
शुभेंदु अधिकारी का भाजपा में शामिल होना बंगाल की राजनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हुआ और वह जल्द ही राज्य में पार्टी के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक के रूप में स्थापित हो गए।
शुभेंदु अधिकारी का सबसे बड़ा राजनीतिक दांव 2021 में नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र में ममता को चुनौती देना था, जहां उनकी जीत ने उन्हें पूरे राज्य लोकप्रियता दिलाई।
उस जीत ने न केवल दशकों से इस क्षेत्र में राजनीतिक रूप से सक्रिय अधिकारी परिवार के प्रभुत्व को मजबूत किया, बल्कि शुभेंदु को राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता के पद तक भी पहुंचा दिया।
भाजपा की विचारधाराओं के अनुरूप ढलने और भविष्य में पार्टी में अहम पद हासिल करने के लिए शुभेंदु अधिकारी ने भूमि अधिग्रहण आंदोलन के एक समावेशी नेता से अपनी छवि को 'हिंदुत्व ब्रिगेड' के प्रतीक के रूप में बदलने का काम किया। उन्होंने दावा किया कि अगर तृणमूल चुनाव जीतती है, तो वह "पश्चिम बंगाल को बांग्लादेश बना देगी।"
पंद्रह दिसंबर 1970 को पूर्व मेदिनीपुर जिले के कारकुली गांव में दिग्गज राजनीतिज्ञ शिशिर अधिकारी और गायत्री अधिकारी के घर जन्मे शुभेंदु ने शुरुआती पढ़ाई कोंटाई हाई स्कूल से की।
प्रभात कुमार कॉलेज से कला में स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद शुभेंदु अधिकारी ने कोलकाता के रवींद्र भारती विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की, जहां राजनीति में उनकी दिलचस्पी जगी।
अपने प्रारंभिक वर्षों के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की शाखाओं में शामिल होने वाले शुभेंदु अधिकारी ने 1980 के दशक के अंत में कांग्रेस के छात्र संगठन 'छात्र परिषद' के सदस्य के रूप में राजनीति में कदम रखा।
उन्होंने 1995 में पहली बार चुनावी राजनीति में किस्मत आजमाई और कांथी नगरपालिका के पार्षद चुने गए, जिसका नेतृत्व उनके पिता शिशिर अधिकारी ने 1967 से 2009 तक किया था।
शुभेंदु अधिकारी 1999 में अपने पिता के साथ तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने दो बार 2001 के विधानसभा चुनाव और 2004 के लोकसभा चुनाव में चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों बार असफल रहे। अंततः शुभेंदु अधिकारी को 2006 में सफलता मिली, जब उन्होंने कोंटाई विधानसभा सीट जीती।
साल 2007 में नंदीग्राम में हुए कृषि भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ने बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया और शुभेंदु अधिकारी को तृणमूल की अग्रणी पंक्ति में ला खड़ा किया।
शुभेंदु अधिकारी जल्द ही तृणमूल के 'कोर ग्रुप' के सदस्य बन गए और उन्हें पार्टी की युवा इकाई का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। 2009 और 2014 में उन्होंने तामलुक से लोकसभा चुनाव जीता।
ममता बनर्जी के 2011 में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के बाद ज्यादातर लोगों ने शुभेंदु को उनके उत्तराधिकारी के रूप में देखा।
हालांकि, दोनों नेताओं के बीच अविश्वास का बीजारोपण उसी साल 21 जुलाई को तृणमूल की पहली वार्षिक शहीद दिवस रैली में हुआ, जब ममता ने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के राजनीति में प्रवेश की घोषणा की।
उस समय मात्र 24 साल के अभिषेक को तृणमूल कांग्रेस की युवा इकाई का अध्यक्ष बनाया गया। इस फैसले से शुभेंदु बेहद नाराज थे।
शुभेंदु अधिकारी ने ममता के नेतृत्व वाली राज्य सरकार में मई 2016 से नवंबर 2020 तक परिवहन मंत्री और 2018 से 2020 तक पर्यावरण मंत्री के रूप में काम किया।
भाषा जोहेब धीरज
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